Thursday, December 17, 2020

तुम दिल में कब आ बसे मुझे पता न चला

हम मिले बेशक दो अजनबियों की तरह थे,
मगर तुम दिल में कब आ बसे मुझे पता न चला!

अपनी आँखों में राखी थी मैने इज्जत तुम्हारे लिए,
इसमें प्यार कब उमड़ आया मुझे पता न चला!

यूँ तो शराफत और सादगी लुभाती थी मुझको,
तेरी शरारतों पर कब फिसल गया पता न चला!

खुली जुल्फों से आती थी जो तुम्हारी भीनी-भीनी खुशबु,
जाने कब खामोश जंगल सी हुई मुझे पता न चला!

अधरों पर चमकती थी जो सूरज की लालिमा,
वो मदहोश लैब बेसुध क्यों हुए मुझे पता न चला!

तेरी उदासियां तेरी बेचैनीया तेरी परेशानियों
कब पता चला  ये मुझे पता ही न चला 

वजह चाहे जो हो तेरे इस घुट-घुट के जीने की,
मेरे खुश होने की वजह अब तुम हो शायद तुम्हें ये पता न चला!!

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