चीखे मेरी कलमो की
मेरी सोच मेरी कलम से, कहानी, पोएम, नोवेल, एहसास और कलम, हिंदी साहित्य
Monday, September 28, 2026
Friday, September 25, 2026
गांव, गरीब, और सरकार
गाँव के लोगों का आधा समय फोटोकॉपी कराने में और बाकी समय सरकार की योजनाओं के चक्कर में निकल जाता है।
सरकार गाँव के लोगों को फुर्सत ही नहीं देती, आधार-पैन कार्ड की फोटोकॉपी की स्कीम खत्म भी नहीं होती कि राशन कार्ड, खसरा-खतौनी और वोटर कार्ड की नई स्कीम ले आती है।
गाँव का गरीब, गरीबी से ज़्यादा इन्हीं कागजों में उलझा हुआ है।
Author Vinod Kushwaha
Wednesday, September 23, 2026
प्रजातंत्र और प्रजा
इस देश में जब तक कोई पोल पर न चढ़े,
आग न लगाए, हत्या न करे, आत्महत्या न करे,
किसी अधिकारी-नेता की गाड़ी के आगे न आए,
तब तक गरीब की आवाज़ इस देश में कोई नहीं सुनता!
शायद इसलिए गरीब को ऊपर जाकर या भेजकर बोलना पड़ता है।
Tuesday, September 8, 2026
खुशी त्यागी जा सकती है दुःख नहीं
खुशी त्यागी जा सकती है, दुख को त्यागना नामुमकिन है,
रेगिस्तान ने त्याग दिया हरियाली को फिर वो कभी त्याग नहीं सके रेगिस्तान, बंजर जमीन,
रेगिस्तान कभी हरा-भरा नहीं बन पाया।
खुशी प्राप्त की जाती है इसलिए त्यागी जा सकती है
दुख स्वयं आता है इसलिए त्यागा नहीं जा सकता।
विरोध होना चाहिए
विरोध होना चाहिए सरकार हो, राजा हो, नौकरशाह हो
सबका विरोध होना चाहिए,
देश में हर दोगलेपन का विरोध होना चाहिए।
जिससे देश की अखंडता, प्रेम, जाती धर्म
सब बचा रहे।
विरोध समाज का अभिन्न अंग है।
विरोध न होना गुलाम हो जाने का प्रतीक है।
— Vinod Kushwaha —
Blog: चीखें मेरी कलमों की
जिम्मेदारियां हादसों से भी भरी होती है।
कोल्डड्रिंक समोसे के पैसे बचाकर
कॉपी किताब खरीदने वाले लड़के,
जीवन में कई हादसे लिए जीते हैं।
ये लड़के कभी बिगड़े नहीं,
ये लड़के मौन हो गए उमर भर के लिए
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