Saturday, November 30, 2024

उम्र और हम वहां से यहां तक

आटा चकी पे गेहूं के बोर पे पिता का नाम न लिखकर अपना नाम लिखने से लेकर साइकिल की चैन खुद से चढ़ाने तक का दौर हमे बढ़ते जिम्मेदारियों का एहसास करता गया। और कब कहा कैसे एक एक दिन अतीत बन गया। और बढ़ती उमर, और बढ़ती जिम्मेदारियों हमे वहां से यहां तक ले आई। अतीत की जिम्मेदारियों हमे मजबूत बनाती गई और एक दिन हमे कुम्हार के घड़े के जितना जिम्मेदार बना दी। मिटी पानी से गल कर मिट्टी पानी को ही सहारा देने जैसा हर मिडल क्लास लड़के इक उमर के बाद पत्थर सा हो जाते है। और जीने लगते है। अपने अनगिनत सपनों को मार के किसी के सपनों के लिए, 

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