Tuesday, January 11, 2022

खामोशियाँ सुनने का हुनर तुम्हीं से सीखा है

कई दफ़ा कलम उठाता हूँ
तुमसे कुछ कहने के लिए
हाथ सर्द पड़ जाते हैं और
स्याही सूख जाती है
जूझती है निभ कुछ देर
कलेजा फट जाता है पन्नों का
अफ़सोस कि बस कोरी चीखें ही
पैदा होती हैं इसे
मंसूबा करता हूँ फिर फ़ोन करने का
मगर अब मेरी आवाज़ से भी तो परहेज़ है तुम्हें
ख़ामोश बड़बड़ाता हूँ ज़हन में फिर
झुंझलाहट से चेहरा तमतमाता है मेरा
तभी अचानक से आ जाती हो तुम
कहती हो कहो क्या कहना है ख़्वाब
खामोशियाँ सुनने का हुनर तुम्हीं से सीखा है मैंने

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