Friday, March 12, 2021

कहने दो

जो लबों तक आकर लौट जाते हैं,
दिल की दीवारों से टकराते हैं,
दिमाग की सलाहों में उलझ जाते हैं,
जज़्बात ही तो हैं…. कहने दो |

किया तो था बयान बार-बार,
पर शायद तुमको याद नहीं |
अब जो राहें अलग हो चुकी,
न कहो साथ चलने…मुड़ने दो |

हाथों से कुछ कुछ छूट रहा,
शीशे सा कुछ टूट रहा |
जो आँखों से छलक रहे,
आंसूं ही तो है…बहने दो |

कभी और लगाएंगे हिसाब-किताब
क्या खोया और क्या पाया,
थोड़ा खुद को समेट तो लूँ,
अभी कुछ न पूछो….रहने दो |

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