Thursday, May 21, 2026

No circulatory system, no respiratory system, and no complex nervous system. No need for a head, heart, or lungs for survival. Cockroach has unique survival powers and is highly resistant to radiation effects. It is one of the toughest creatures on Earth with 13 chamber of heart.  CJP known as Cockroach Janta party. 

Monday, April 27, 2026

पॉलिटिकल

हाइड्रा, सीलेंट्रेटा का सदस्य है! या फिर उसने भी बीजेपी जॉइन कर लिया ?

Saturday, April 25, 2026

खानदानी पेशा धंधे का

गलती हुए हो तब न माफ किया जाए। सुन है मर्दों को झूठे केस में फसाना उसका खानदानी पेशा है। 

Sunday, April 19, 2026

बदलते व्यवस्य

जब धंधेबाज महिलाओं ने कोर्ट में धन्धें के लिये लाइन लगाई, तब जो असली प्रताड़ित महिलाएं थीं वो अपनी असली हक पाने से पीछे छुट गई, महिलाएं ही खा गई महिलाओं का हक। महिला सशक्तिकर कुछ महिलाओं का धंधा बन गया। 

Friday, April 17, 2026

कोर्ट कचहरी को धंधा बनाती महिलाएं।

सुंदर, सुशील, MBA, MCA की हुई महिलाएं, जब शाम को शराबी पति से गाली और मारपीट खाने के बाद, सुबह में फिर नाश्ते तैयार कर उसी शराबी पति को ऑफिस भेजती, देख के कई सारे ख्यालों के साथ बस यही सोचता हूं। आज के दौर में, ये महिलाएं कितने कस के पकड़ी हैं। रिश्ते की डोर को, जो इस हालत में भी फेविकिट के तरह जुड़ा हुआ है। रिश्ते की डोर। जो पति को किसी दूसरे के मुंह से शराबी शराबी सुन ले तो झगड़ जाती है। वर्ना आज के दौर में कोर्ट जा के पता चलता हैं। अनपढ़ गवार दो अक्षर जानने के बाद महिलाएं कैसे फैमिली कोर्ट में खुद को सुप्रीम कोर्ट के जज मन बैठी है, 

Thursday, April 16, 2026

अच्छे लोग अच्छे की तलाश में

ब्याह दी गई अच्छी सुन्दर लड़कियों, शराबियों, सट्टेबाजों और नशाखोर से, अच्छे शरीफ लड़के ब्याहे गए चरित्रहीन मुकदमे बाजों से, हर अच्छा इंसान अच्छे की तलाश में ताउम्र भटकता रहा। दो समांतर रेखाओं की तरह। 

Saturday, April 4, 2026

नए दौर के मासूम लोग

बचा रखा है सभ्यताएं और संस्कार आज भी उन लड़कियों और महिलाओं ने जो आज के दौर में भी दिख जाती है। 36 इंच की साइकिल के करियर पे बैठ के जाती हुई, अपने पिता या पति के साथ। 

Tuesday, September 16, 2025

बचपन बच्चों जैसा होना चाहिए

बरसात के दिनों में क्लास में बच्चों को घर जा के बरामदे और बंगले में बैठ के पढ़ने की बातें सुनते हुए हमने घर जा के त्रिपाल को बांस के खंभों में फसा के उसके नीचे बैठ के ढिबरी के उजाले में राते बिताई है। 
हर उस सवाल का जवाब नहीं था। कि तुम कहा बैठ के पढ़ते हो बंगले में या बरामदे में ?। कुछ सवाल लंबे वक्त तक घर कर जाते हैं। वक्त बीतने के बाद भी।  

Sunday, August 3, 2025

उम्र बस एक नंबर

उम्र में उम्रदराज होना या किसी चीजों का ज्यादा दिन तक अनुभव होना, ये साबित नहीं करता कि, सामने वाला ज्यादा अनुभवी है। या जायदा समझदार है। उम्र एक समय मात्र है। इससे समझदारी की तुलना नहीं कर सकते। अनुभव, समझदारी तो इस बात पे निर्भर करती है कि, सामने वाला किसी चीज को किस गंभीरता से देखता है। सोचता है। समझता है। मानता हु कि उम्र ने बहुत अनुभव दिए होंगे। हो सकता है। वो सारा अनुभव किसी और मौसम का रहा हो। क्लास में एक बच्चा लगातार ३ वर्षों से असफल होता रहता है। उसी क्लास में एक नया बच्चा पहली साल में सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर लेता है। और असफल हुआ बच्चा फिर असफल हो जाता है। कुछ चीजें आदमी जन्म से ले के पैदा होता है। जो खुद सीखता है। किसी के सिखाने से जायदा सीखता है। वो उस चीज से ही नहीं सीखता जिससे उसकी जरूरत हो। या समाज ने बताया हो। बल्कि वो हर उस चीज से सीखता है। जो उसके सामने दिखता है। वो सीखता है। एक एक बूंद बूंद से जो प्रकृति में व्याप्त है। जिसने हर सामने पड़ी चीजों को जाना है। उससे सीखा है जो भी नजर आई। उस आदमी का जीवन का ५ सालों का अनुभव किसी ऐसे ४० साल के अनुभवी से जायदा है। जिसने एक रस्ते पे चला है बस एक चीज को ही देखते। समय के साथ मौसम बदल जाता है। उम्रदराज हो के आप गलत को सही नहीं बना सकते। क्या पता आपका अनुभव बरसात का रहा हो। और मौसम बदल गया हो। बात जाड़े की बात हो रही हो। समय के साथ चीजें बदल जाती है। पुराने कारीगर नई मशीनें नहीं बना पाते। उमर देता है अनुभव लेकिन एक उमर तक ही। 

Sunday, July 27, 2025

त्रासदी

जीवन के हर त्रासदी के बाद आदमी के हिस्से में इतना जरूर आना चाहिए, राशन, मिटी, पानी और प्यार जिसके सहारे वो जी सके बाकी बची उम्र। 

Saturday, April 12, 2025

पूर्वांचल एक्सप्रेस

       Vinod Kushwaha 
हर नई पीढ़ी आती है बड़ी होती है और कोई एक्सप्रेस पकड़ती है दूर दराज शहर को चली जाती है। सदियों से ये हमारी एक परंपरा का हिसा बन चुका है। पूर्वाचल के गांवों का हाल और बिहार का एक़ जैसे ही है। 
लेकिन पूर्वाचल के लोगों को बिहारी बोल देने पर दिल पे ले लेते है। कि हमे पिछड़े और पुराने सोच से जोड़ा जा रहा है। लेकिन हकीकत एक जैसा ही है। क्या पूर्वांचल में ऐसा नहीं है। ऐसा यहां भी है। यह भी।     
"हर चलती रेल पश्चिम की तरफ ले जाती है। बहुत सारे मजदूर जिन्हें घर के चूल्हे जलाने है। और घर में छोड़ जाते है बहुत सारे ऐसे लोग। जिनकी बहुत सारी उम्मीदें है। उनसे जो पश्चिम को जा रहा हैं। किसी एक्सप्रेस में बैठ के किसी दूर दराज शहर को किसी कॉन्ट्रैक्शन के ठेकेदार से बात कर के। ऐसा तो नहीं है न कि कोई परंपरा है। इनकी कंस्ट्रक्शन मजदूर का जो सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी चल रही है। हमे समझ नहीं आता इनके पिछड़ने की वजह कौन है। पुरानी परंपराएं। पुराने लोग। पुरानी सोच। या सरकारें है। जिनकी योजनाएं जिले तक आ जाती होंगी। लेकिन गांव तक नहीं पहुंचती। बड़ी नजदीक से देखा है, हमने पूर्वांचल को। कैसे सरकारी योजनाएं जो किसी व्याक्ति विशेष के लिए बनी होती हैं। उन तक पहुंचने से पहले न जाने कितने हिस्से में बट जाती है। जिले से चल कर गांव तक हर योजनाएं थक जाती है। यकीन मानिए। मै ये बात विश्वास से बोल सकता है। कि एक १०० लिटर पानी का टैंक किसी पूर्वांचल के जिलों से गांव के किसी एक व्यक्ति तक भेजा जाएगा, सरकार द्वारा तो गांव जाते जाते २० लीटर बच जाएगा। और उस व्यक्ति को एक ग्लास पानी पिला कर बोल दिया जाएगा बोल देना हमे पानी मिल गई।  सरकारी योजनाएं किसी एक व्यक्ति के लिए तो होती है। लेकिन उसको मंदिर में चढ़ी प्रसाद की तरह बांट लिया जाता है। और हर सरकारी योजना पे सरकारी कर्मचारी लुगाई समझ के अपना हक जताते हैं। यकीन मानिए पूर्वांचल में हर सरकारी योजनाएं छेड़छाड़ का शिकार होती है। 

Thursday, April 10, 2025

पूर्वांचल एक्सप्रेस (नॉवेल)

पुराने ज़माने की बातें जब भी सुनता हूँ, तो लगता है—सच में कुछ ख़ास नहीं बदला है। यहाँ अब भी वही पुरानी चीज़ें हो रही थीं, वहां इर्द गिर्द।
बच्चे ३.४ किलोमीटर पैदल ही स्कूल जाते थे। एक घर से दूसरे घर आग ले जाना पड़ता था। ताकि माचिस बचाई जा सके। झाड़ियों में से एक पेड़ की लकड़ी तोड़कर उसकी छोटी सी टहनी से पेन बना कर स्कूल की कॉपी में लिखा करते थे। जहाँ तक मुझे याद है, मेरे हाथ आने तक लकड़ी बच गई थी—क्योंकि तब तक स्लेट और कॉपी का दौर शुरू हो चुका था, एंट्री लेवल के बच्चों के लिए पटरी की जगह स्लेट ले चुका था।
बिजली की बल्ब देखे नहीं थे। हा डिबरी की जगह लालटेन ले चुका था। और मोटे सेल और बड़े बल्ब वाले स्टील की टार्च की जगह लेड स्ट्रिप बल्ब और पतले सेल वाले टार्च का दौर शुरू हो रहा था। मीटी के तेल से जलती रोशनी के बाद जो दूसरी रोशनी हमने देखी थी। वो थी गोबर गैस की, रंग दूधिया था। जो वन इंच की बल्व थी जिसको पुराने सेलों से कनेक्ट कर के गोबर में सेट कर के तैयार किया था। ये गांव तक पहला लेड लाइट था। बड़ी खुशी हुए थी इस उजले को देख के। लेकिन क्षमता इतनी नहीं थी प्रकाश की वो अच्छे से छोटे लिखे शब्दों को पहचान दिला सके। इस लिए हम लालटेन ही प्रयोग में लाते थे। लालटेन और डिबरी के साथ जो लगाओ और अपनापन था न ओ बस वही बता सकता है जो इस देश के पिछड़े इलाकों से आता है।
 हा लालटेन डिबरी से अच्छा था। क्यों कि गिरने का डर कम रहता था। कई बार डिबरी गिर कर आग पकड़ लेती थी बिस्तर में अगर पढ़ते समय नींद आ गई और सो गए तो क्यों कि चारपाई ढीली और हिलती रहती है। चारपाई ही सोने बैठने के लिए प्रयोगों में लाया जाता था। ऐसा नहीं था कि लालटेन अभी आया था। काफी पहले से मार्केट में था । लेकिन लोवर मिडिल क्लास फैमिली हमेशा 20 साल पीछे रहती है। जैसे ट्रेन के बोगी में लोवर मिडिल क्लास जनरल में और उसी ट्रेन में कुछ लोग एसी में। एक ही ट्रेन मे जनरल बोगी से ऐसी तक का सफर में एक पीढी के साथ वर्षों लग जाते है।

Thursday, April 3, 2025

पूर्वांचल एक्स्प्रेस नोबेल

एसी कोच  से जनरल कोच  तक, जनरल  कोच से एसी  कोच  तक का सफर बताता है।  इस देश में कितनी विविधता है।  जनरल कोच में बैठ के अतीत को देख रहा था ६ सालो बाद। और सोच रहा था। उस दौर के बारे में जब कॉलेज में थे और कंप्टेटिव एग्जाम के सिलसिले में अक्सर शहर को जाना होता था। २०१५ से लेकर २०१८ तक जनरल कोच में। न जाने कितने अनगिनत  सफर तय किए याद नही है। उस समय जब लोगो को ट्रेन के जनरल कोच में देखता जाते हुए और खुद भी जाता था । तो सोचता था की कब निकलेंगे हम इससे बाहर। हमसे तो एक मिनट नही रहा जाता इसमें दम घुटने लगता है। मैं अक्सर एसी कोच  को देखकर सोचता था। वो कौन लोग है जो सीसे वाली बोगी में बैठते है। उस टाइम तक मुझे पता था की स्लीपर और ऐसी कोच अमीर पढ़े लिखे लोग० जाते है। इस लिए भी मुझे पढ़ना था ! कुछ बनना था तब। आज भी यही सोच रहा था कितनी विविधता है न एक ही ट्रेन के अंदर। सोचते हुए। कोच में एक नजर डाला तो देखा। फटी गंजी, हाफ पेंट, लुंगी में पसीनो से तरबतर, सुखी रोटी के साथ आचार खाते लोगो को ट्रेन के कोच के फ्लोर पर सोते हुए। कई लोगो के ऊपर पैर रख के लोग जा रहे है। भीड़ इतनी थी की दोनो पैर एक साथ रखने की जगह नही थी । और लोग ३ दिन की यात्रा करते आ रहे थे। फिर हमें सोचने लगे आखिरकार देश की हालत आज भी हम वही है। बुलेट ट्रेन, बंदेमात्रम, और हवाई यात्राएं करने वाले लोगो को क्या पता गरीबी कितनी पीड़ादायक होती हैं । और गरीब रहता कहा है। 
इस देश को गहराई से देखना है तो ट्रेन की जनरल  कोच को देखना चाहिए।  ताकि समझ आए हम विकाश कितना कर गए है। और कहा तक । गरीबों के लिए ५ किलो चावल पर। और अमीरो के लिए  बुलेट ट्रेन और बंदेमात्र्म ट्रेन जैसी सुविधाए पे ज्यादा जोड़ दिया जाता है। न की गरीबों के हालत पर।  खैर बोलने पर पाबंदियां है और लिखने पर लगाई जा रही । तो  लिखते वक्त भी बहुत सोचना पड़ता है। क्यों की लगता तो ऐसा ही है। कि अनुच्छेद 19 - बस कागजो मे ही लिखा है। 

Saturday, November 30, 2024

उम्र और हम वहां से यहां तक

आटा चकी पे गेहूं के बोर पे पिता का नाम न लिखकर अपना नाम लिखने से लेकर साइकिल की चैन खुद से चढ़ाने तक का दौर हमे बढ़ते जिम्मेदारियों का एहसास करता गया। और कब कहा कैसे एक एक दिन अतीत बन गया। और बढ़ती उमर, और बढ़ती जिम्मेदारियों हमे वहां से यहां तक ले आई। अतीत की जिम्मेदारियों हमे मजबूत बनाती गई और एक दिन हमे कुम्हार के घड़े के जितना जिम्मेदार बना दी। मिटी पानी से गल कर मिट्टी पानी को ही सहारा देने जैसा हर मिडल क्लास लड़के इक उमर के बाद पत्थर सा हो जाते है। और जीने लगते है। अपने अनगिनत सपनों को मार के किसी के सपनों के लिए, 

Tuesday, November 5, 2024

समाज से बिछड़े हुए लोगों

समाज में कुछ ऐसे लोग है। जो जमीन पर तो है पर समाज से मुलाकात नहीं हुई है। उनको पता ही नही समाज हैं क्या। कैसे काम करता है। उनको दुनिया की हकीक़त ही पता नहीं है। की समाज में क्या हो रहा कैसे रहा जाता है। मैने देखा है कुछ लोगों को। जिनको घर द्वार गांव समाज से कुछ लेना देना नहीं है। बस एक रूम का किराया ले के किसी शहर पे पड़े है वर्षों से। कुछ पैसे कमाते है। और फैमिली को परवरिश करते है। बस इतना ही पता है। फैमिली में कितने मेंबर है। उनके बीच क्या हो रहा। इससे बाहर की समाज कया है। इनको नहीं पता। ये एक कुएं के मेढक जैसे लोग हैं। जिनको लगता है । जो परिवार के बीच खयालात है। वही समाज है। उसी हिसाब से समाज चलता है। उसी हिसाब से समाज सोचता हैं। ऐसे लोग जब समाज में आते है। या ऐसे घर पे पले बढ़े लोग जब किसी दूसरे फैमिली या समाज से मिलते है। तो ये उस फैमिली और समाज से बहिष्कृत हो जाते है। क्यों कि इनकी मानसिकता ही सामाजिक नहीं होती। क्यों कि ये पहले से समाज को जानते नहीं है ये समाज के तौर तरीकों से वाक़िफ नहीं होते। न समाज से कभी मिले होते है। इनके लिए बाहर का समाज वही है जो घर का माहौल रहा है। एक कमरे के अंदर कैसा माहौल है। वहीं समाज है। उनके लिए ऐसे घर के बच्चे समाज में नहीं रह पाते। न किसी फैमिली के मेंबर के लायक रहते है। ये समाज को स्वीकार नहीं कर पाते। समाज को समझने के लिए समाज में उठना बैठना पड़ता है समाज का हिस्सा बनना पड़ता है। समाज के हिस्स बन के समाज को समझना। ये उतना ही जरूरी है जितना। शिक्षा, नौकरी। ये भी एक परिवारिश का अहम अंग है। पैसा कमा लेना इंसान को समझदार सबित नही करता। दो शब्द है। होनहार और समझदार , सामाजिक इंसान हमेशा समझदार होगा। होनहार होना स्किल और किताबी है। होनहार हमेशा होशियार दिखता। जबकि समझदार समाज को समझता है। और समझदारी दिखता है।

Monday, September 30, 2024

अनसुलझे लड़के

एक बिगड़े हुऐ लडको को संवारती है । एक प्रेमिका, जिनके हिस्से में प्रेमिकाएं नही आई। वो अनसुलझे हुऐ लड़के किसी पत्नी की हिस्से में आ गए। 

Friday, March 15, 2024

सरकारी टोटके और सरकार की जनता


बोलोगे तो मारे जाओगे 
हा में हा नही मिलेगी तो मारे जाओगे
उनके रंग में ही रंगना होगा। दूसरा रंग अपनाओगे तो
मारे जाओगे
हक मांगोगे तो कटघरे में खड़े कर दिए जाओगे आवाज 
उठाओगे तो मारे जाओगे ।
उनकी कही बातों को न बोलोगे तो देशद्रोही कहलाओगे
बदलती जा रही है। सरकारी तंत्र की तरह सरकारों की मानसिकताएं जनता के प्रति।
फिर भी आम आदमी के बीच विश्वास कायम है सरकार के प्रति ।
४ लाठी सरकार से पिटता हवा, भ्रष्टाचार से रोज २, ४ होता हुवा इस देश का आदमी, ५ किलो अनाज पाने के बाद उसी सरकार की रैली के लिए भूखे पेट फिर तैयार हो जाता हैं ।जिंदाबाद जिंदाबाद करने के लिए।

हकीकत तो यही बता रहीं है। आज भी इस देश के एक तिहाई लोग की औकात क्या है। आजादी से अब तक।  मैं भी उन हिस्सा का एक पार्ट हु। और गौर से कह सकता हु। की ५ किलो अनाज और ऐसे योजनाएं एक ऐसी दवा है की न बीमारी को ठीक कर सकती है । न दूसरी दवा लेने देगी। पूरा गांव का परिवार जो राशन कार्ड और ५ किलो अनाज की सेवाएं लेते आया है। ओ आज भी इन्ही चीजों में उलझा है। और शिक्षा से वंचित रह गया है। स्कूल भेजने से ज्यादा सरकारी लाभ पाने पे जोड़ दिया जाता रहा है। आधार, पैन कार्ड और फोटो कॉपी से न जाने कब बाहर निकलेगा एक अहम हिस्सा इस देश का। इसका कोई आंकड़ा ही नही है। खैर ५ किलो अनाज को हम ऐसे ही देख रहे है। बाबा की भाबुत की तरह जो बीमारी के लिए बाट रहे लेकिन उससे न बीमारी ठीक हो रही न लोगो का बाबा के प्रति और भाबूत के प्रति विश्वास कम हो रहा। खैर लिखते हुवे भी हम दो हिसो में बट गए हैं। न बाबा के खिलाप लिख पा रहे है न बाबा के तारीफ़ में क्यों की हम भी उसी हिस्से का एक पार्ट जो है। सच बताऊं तो कोई किसी का लहर नही था चुनाव में। बस २००० रूपया और ५ किलो अनाज की लहर थी जो अब तक है। 

(फ्री की ५०० रूपया मिलने पर एक तबके इतना खुश हो जाता है उसे कुछ दिखता ही नही है। गलत सही देने वाले के सिवा। उपहार को ही देख लो लोग पा कर कितना खुश हो जाते है। ये अलग बात है की बकचोदी है की इसमें प्यार होता है। इसमें पैसा की बात नही होती। फिर सस्ते उपहार पे लोग उसका तिरस्कार क्यों करने लगते है। मेरा कहने का मतलब है । की मुक्त में थोड़ी थोड़ी कीमत दे के इंसान से कुछ भी कराया जा सकता है। जैसे सरकार ५ किलो अनाज देकर गरीब से २००० रुपए देकर किसान से। कुछ उपहार देकर आशिक अपनी मसूका से। )

Wednesday, February 14, 2024

ख्वाहिशों की अंतिम तिथि

एक लंबे टाइम के संघर्ष से गुजर जाने के बाद अपनी इच्छाओं को मार के जीने के बाद। एक अवस्था ऐसी आ जाती। की खुशी मिल जाने का भी कोई अर्थ नही रह जाता हैं। फिर खुश होना एक ढोंग लगने लगता है। वो लड़के कभी खुश ही न हो सकें खुशी मिलने के बाद भी जिनकी जीवन शुरुआती दौर ही संघर्षों से भरा था। ये अपने इच्छाओं खून कर दिए उस दौर में ही। जो अब ताउम्र जीवित नहीं हो सकती। इनकी जीवन निस्पृह हैं। ये लड़के वंचित रह गए बहुत सारी चीजों से जो खुश होने का जरिया था। एक उम्र में । उस उम्र में उन चीजों का बस दर्शक बने रहे तसल्ली से, बस इनका जुर्म ये था कि, ऐसे स्मान्य परिवार से ताल्लुक था इनका कि। जब चलना सीख रहे थे ये लड़के बचपन में तो इनको छोड़ दिया गया जा चल ले बिन किसी सहारे के फिर ये खडे हो के चलने के सहारे के लिए लकड़ी खुद रेंग कर उठाई थी " ये लड़के अच्छे महंगे   विलासिता जीवन के जीने के बारे मात्र में सोच भर ले तो लगता है की पाप तो नही कर रहे। इच्छाओं को मर जाना ही जीवन में मोहभांग हैं" इन लड़को को इच्छाओं से क्या ताल्लुक रहा होगा अब तक। ये बता पाना मुश्किल है। 

Tuesday, November 28, 2023

रूढ़िवादी विचारधारा और महिला सशक्तिकरण

चूल्हे चौका, बिंदी, टीका, और घूंघट से निकलकर
महिलाओं को। देश, नौकरी, राजनीति, समाज, पे बाते करने तक का सफर सदियों से आज तक एक मील नहीं चल पाया। आज भी देश का आत्मा कहे जाने वाले देहात इन Conservative ideology के कटीले बेरिया में इस कदर जकड़ा हूवा है। की इससे निकलने में सदियों लग जायेंगे। विकासशील से विकसित देश की तरफ ले जाने कि कल्पना इन  रूढ़िवादी विचारधारा के साथ बस एक स्वपन सा लगता हैं। इन रूडी वादी विचारो ने लोवर तबके के महिलाओं को आज भी चूल्हे चौका, बिंदी, टीका, और घूंघट तक समेट कर रखा है।  पीढ़ियों के साथ विचारो को अंत हो जाना चाहिए और ये आखिरी पीढी है जो इन विचारो के साथ सिमट जाना चाहिए। लेकिन आज भी लड़कियों के साथ ये विचार नई पीढ़ियों तक आगे जा रहे है । आज भी ब्याही जा रही लड़कियों १०th और १२th करने के बाद इसी मानसिकता से की उन रूढ़िवादी विचारो को ही तो चलाना है। शहरो के महिलाओं के देख कर हम नए युग की जो कल्पना कर लिए है। ओ निर्धार ही हैं। क्यों की देहात और लोवर तबके की महिलाएं भी इसी देश की महिला जनसंख्या को दर्शाती है। और वो आत्म निर्भर क्या उनको अपना राईट भी पता नही हैं। क्यो कि उनको उनका राईट एजुकेशन से वंचित रखा गया.l  Women Education help for women empowerment and Lack of Women empowerment leads to women domestic violence, 

   𝒜𝓊𝓉𝒽ℴ𝓇 
𝓋𝒾𝓃ℴ𝒹 𝓀𝓊𝓈𝒽𝓌𝒶𝒽𝒶                    

Friday, October 13, 2023

अस्तित्व

रेगिस्तान में पानी की कमी है
लिहाजा वहां पेड़ो की पत्तियों ने कठोर 
काटें बनकर बचाया अपना अस्तित्व;
जिनके जीवन में प्रेम की कमी है
वे स्वयं को बचाने के लिए पत्थर में
तब्दील जाते हैं। कठोर होने का मतलब निष्क्रीय
होना नहीं हैं। कठोर होना टुटने से बचना भी है।


No circulatory system, no respiratory system, and no complex nervous system. No need for a head, heart, or lungs for survival. Cockroach has...